अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से मशवरा | ALLAH Tala Ka Farishton Se Mashwara

Barelvi.in
0

अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से मशवरा | ALLAH Tala Ka Farishton Se Mashwara

 

अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से मशवरा  |  ALLAH Tala Ka Farishton Se Mashwara
अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से मशवरा

 

अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से मशवरा :

अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तख़लीक से पहले फ़रिश्तों से मशवरा किया ।
और याद कीजिए ! जब आपके रब ने फ़रिश्तों से फ़रमाया बेशक मैं बनाने वाला हूं ज़मीन में (अपना ) नायब |
बकरा ३० )

 

मशवरा करने की हिकमत :

अल्लाह तआला का फ़रिश्तों से फ्रमाना कि मैं ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाने वाला हूं माज़ल्लाह उनसे इजाज़त तलब करना मक़सूद नहीं था बल्कि सिर्फ मशवरा तलब करना था और वह भी एहतेयाजी या ला इल्मी की वजह से नहीं, क्योंकि अल्लाह तआला किसी अम्र में किसी का मोहताज नहीं बल्कि मशवरा तलब करने में हिकमत यह थी कि इसमें फ़रिश्तों और ख़लीफ़ा का इकराम पाया जाये, क्योंकि रब तआला का फ़रिश्तों से मशवरा तलब करने में फ़रिश्तों की अज़मते शान वाज़ेह होती है और ख़लीफ़ा के मुताल्लिक मशवरा करने में ख़लीफा की अज़मत भी वाजेह होती है कि उसकी तख़लीक से पहले ही उसका नूरानी मखलूक में ज़िक्र हो रहा है। 

 

 हदीस मरफूअ :


बेशक मेरे रब ने मेरी उम्मत के बारे में मुझसे मशवरा तलब फरमाया ।

यह मशवरा तलब करना भी उसी हिकमत के पेशे नज़र था कि इसमें हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपकी उम्मत की इज़्ज़त अफ़ज़ाई हो । अल्लाह तआला ने अपनी ला इल्मी या एहतेयाजी के तौर पर माज़ल्लाह नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मशवरा नहीं किया। इसी तरह अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हुक्म फ़रमायाः आप इनसे, उमूर में मशवरा करें ।

यहां सहाबा किराम से मशवरा करने का हुक्म इस लिये नहीं दिया गया कि आप सहाबा किराम के मशवरा के मुहताज थे बल्कि सहाबा किराम की इज्ज़त अफ़ज़ाई के लिये मशवरा का हुक्म दिया गया।

और इस वजह से भी अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों से मशवरा किया और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सहाबा किराम से मशवरा करने का हुक्म दिया गया कि लोग इससे सबक हासिल करें और अपने मामलात में एक दूसरे से मशवरा किया करें ।

एतेराज़ : ख़लीफा का मतलब है पीछे आने वाला और नायबे ख़लीफा की ज़रूरत उस वक़्त दरपेश आती है जब असल खुद अपने काम करने से आजिज़ हो, असल का आजिज़ होना या उसकी मौत की वजह से होता है, या उसके गायब होने की वजह से होता है, या मर्ज, थकान वगैरह की वजह से। इन तमाम मायनी के लिहाज़ से अल्लाह तआला का ख़लीफा बनाना दुरुस्त नहीं। वह हय्य ला यमूत है। हमेशा हमेशा के लिये जिन्दा है उस पर मौत के वकूअ का तसव्वुर मुहाल है, वह शहे रंग से भी ज़्यादा करीब है, वह कहीं दूर चला जाये गायब हो जाये, करना भी यह होना भी मुमकिन नहीं कि वह मरीज़ हो जाये, थक जाये, आजिज़ हो जाये, यह भी नामुमकिन है तो अल्लाह तआला के ख़लीफ़ा बनाने का क्या मतलब है?

जवाब : यहां ख़लीफ़ा का मायने पीछे आने वाला नहीं बल्कि नायब है। यानी अल्लाह का नायब होकर ज़मीन व आसमान की अशिया में तसर्रुफ करने वाला हो । नायब बनाने की ज़रूरत भी अल्लाह तआला को नहीं थी, वह मोहताज नहीं बल्कि जिन की तरफ़ ख़लीफा बनाना था उन्हें मोहताजी थी इसलिये कि इंसान बहुत ज़्यादा कदूरतें और जुल्माते जिस्मानिया रखते हैं और अल्लाह तआला बहुत मुक़द्दस है, फैज़ लेने वाले और फैज़ देने वाले में कोई मुनासवत होनी चाहिये जब मखलूक में और अल्लाह तआला में कोई मुनासबत नहीं, मखलूक को वजूद में लाना भी रब तआला की मशीयत थी, तो अल्लाह तआला ने मखलूक के पैदा फ़रमाने से पहले ही उनके फ़ैज़ लेने का यह एहतेमाम किया कि अंबियाए किराम अलैहिमुस्सलाम को वास्ता बनाया जो अपनी नूरानियत की वजह से अल्लाह तआला से फैज़ लेकर अपनी बशरियत के वस्फ़ की वजह से इंसानों तक वह फ़ैज़ पहुंचा दें ।

जिस तरह इंसानों और हैवानों के जिस्मों में हड्डियां और गोश्त है हड्डिया सख़्त हैं और गोश्त नरम है हड्डी अपनी सख़्ती की वजह से गोश्त से गिज़ा हासिल नहीं कर सकती थी तो अल्लाह तआला ने अपनी हिकमते कामिला से हड्डियों और गोश्त के दर्मियान पट्ठे बतौर वास्ता रखे पट्ठे अपने नर्म हिस्से से गोश्त से गिज़ा हासिल करते हैं और अपने सख़्त हिस्से से हड्डी को गिज़ा पहुंचाते हैं।

नुक्ता : अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को ख़लीफ़ा बनाने के मुताल्लिक़ जो मश्वरा किया इससे मुराद सिर्फ आदम अलैहिस्सलाम नहीं और आप की तमाम औलाद भी मुराद नहीं बल्कि आदम अलैहिस्सलाम और आपकी औलद से बाज़ हज़रात जो इस ख़िलाफ़त के मनसब के अहल होंगे यह सब मुराद हैं और वह अफ़राद आदम अलैहिस्सलाम की औलाद में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक पैदा होने वाले तमाम अंबिया व रसूल हैं।

अंबियाए किराम अलैहिमुस्सलाम तमाम के तमाम फ़रदन फ़रदन मासूम हैं लेकिन सिद्दीक़ीन, औलिया, सालेहीन फ़रदन फ़रदन मासूम नहीं, अलबत्ता इज्तिमाई तौर पर ख़ता से महफूज़ हैं। यही वजह है कि उन हज़रात का इज्तेमाई फैसला उम्मत को क़बूल करना लाज़िम हो जाता है। 

 

जब यह साबित हुआ कि ख़िलाफ़त का हक़दार वह है जिसमें यह इस्तेदाद पाई जाये तो खुद वाज़ेह हुआ कि औरत की फ़ितरते सलीमा और तबीयत मुस्तकीमा इस क़ाबिल नहीं कि जुमा या बाक़ी नमाज़ों की इमामत या ख़िलाफ़त यानी हाकमियत उस के सुपुर्द की जाये। औरत अपनी फ़ितरती और तबई कमज़ोरी की वजह से यह काम सर अंजाम नहीं दे सकती । 

 

📗 तज़किरतुल अंबिया


Post a Comment

0Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top